Period End Of Sentence – हापुड की बेटियों पर बनी फिल्म ने 10 साल बाद भारत को दिलाया ऑस्कर

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उत्तर प्रदेश  हापुड़ के एक छोटे से गांव काठीखेड़ा के एक मकान के शुरू हुआ कुछ महिलाओं का सफर आज किसी पहचान की मौहताज नहीं है. काठीखेड़ा गांव की महिलाओं के सफल प्रयासों ने ही भारत को 10 साल बाद ऑस्कर दिलाने की परिकथा लिखी है. फिल्म जगत की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान ऑस्कर यानि एकेडमी अवार्ड के 91वें सम्मान समारोह में भारतीय डॉक्यूमेंट्री पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस को शॉर्ट सब्जेक्ट डॉक्यूमेंट्री में आवार्ड मिला है.

काठीखेड़ा की 7 महिलाओं के एक छोटे से समूह से एक सपना देखा था. सपना था महावरी के दौरान गांव की लड़कियों को पैड उपलब्ध करना, जिससे उन्हें महावरी के दौरान कपड़ा इस्तेमाल न करना पड़े और उससे जुड़ी बीमारियों से बचा जा सके.

पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस को अवार्ड मिलने के बाद चारों तरफ इसकी चर्चा है, लेकिन भारतीय समाज में खुले तौर पर महावरी के बारे में बात करना एक अपवाद है. देश की राजधानी दिल्ली से चंद किलोमीटर दूर हापुड़ के एक छोटे से गांव में महिलाओं का महावरी के समय पैड इस्तेमाल करना और उस पैड का गांव में ही निर्माण करना इताना आसान नहीं था.

पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस का निर्देशन रायका जेहताबची ने किया है. रायका जेहताबची ने ऑस्कर स्वीकार करते हुए कहा कि, मैं इसलिए नहीं गो रही हूं कि मेरी महावरी चल रही है या कुछ भी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि महावरी को लेकर बनी कोई फिल्म ऑस्कर जीत सकती है.’ इस फिल्म का सह निर्देशन भारतीय फिल्मकार गुनीत मोंगा की सिखिया एंटरटेनमेंट कंपनी ने किया है. वहीं इस फिल्म में भारतीय कलाकारों ने काम किया है. मजेदार बात यह है कि जिन्होंने भी इस फिल्म में अभिनय किया है, उन्होंने पहली बार कोई फिल्म की है.

पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस 26 मिनट की फिल्म है, जो हापुड़ की लड़कियों और महिलाओं और उनके गांव में पैड मशीन की स्थापना के ईद-गिर्द घूमती है. फिल्म में जिस संस्था के बारे में दिखाया गया है, वहीं पर स्नेहा काम करती है. और उनके काम करने के पीछे की कहानी है कोचिंग की फीस भरना. स्नेहा पुलिस भर्ती के लिए कोचिंग की जरूरत महसूस करती है. लेकिन कोचिंग जाने के लिए उनके पास पैसें नहीं होते जिसके बाद वो पैड बनाने का काम करती हैं.

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