‘एक देश एक चुनाव’ – पीएम मोदी की कथनी और करनी में अंतर क्यों

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार चुनाव सुधारों की बात करते रहे है. वो कई बार एक देश एक चुनाव की वकालत करते आए है. बीते साल कई बार समय समय पर एक देश एक चुनाव पर बहस होती रही. कयास लगाए जा रहे थे कि, 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ ही कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हो सकते है. इन सभी राज्यों में वो राज्य शामिल थे, जिनके कार्यकाल इस साल के अंत तक या फिर 2021 के शुरूआत तक समाप्त हो रहे है.

पहले खबर थी कि, बीते साल के अंत में, जिन पांच राज्यों के चुनावो की तारीखों को आगे बढ़ाकर, लोकसभा चुनाव के साथ ही इन राज्यों के चुनावों भी कराए जाए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. एक बार फिर खबर आई कि, आने वाले समय में जिन राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उसके साथ साथ हरियाणा, महाराष्ट्र, और बिहार के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनावों के साथ ही होंगे. लेकिन चुनाव आयोग ने साफ किया कि सिर्फ चार राज्यों के विधानसभा चुनाव ही होंगे.

पॉलिटिकल पंडितों की माने तो, बीते 5 सालों में चुनाव दर चुनाव पीएम मोदी का ग्राफ घटता बढ़ता रहा है. लेकिन बीते साल से पीएम मोदी का ग्राफ काफी तेजी से घटा है. और जब पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आए तो उनके नतीजों ने इस बात पर मुहर लगा ही कि आने वाले चुनावों मे मोदी मैजिक बीजेपी के काम नहीं आएगा.

भारतीय वायु सेना ने पुलवामा हमले का बदला लेने के लिए पाकिस्तान में घुसकर, बालाकोट में जैश के कैंप पर एयर स्ट्राइक को अंजाम दिया. इस एयर स्ट्राइक के बाद पीएम मोदी का ग्राफ एकाएक बढ़ गया. वायु सेना की एयर स्ट्राइक से बीजेपी की चिंता काफी हद तक दूर हो गई है. लेकिन फिर भी ऐसा क्या हुआ कि मोदी सरकार एक देश एक चुनाव से पीछे हट गई.

तो सवाल होता है कि, एक देश एक चुनाव से पीछे हटने की कहानी यह है कि, क्योंकि बीते साल बीजेपी पांच राज्यों के चुनाव हार गई थी तो उसके बाद मोदी एंड कंपनी को लगा कि एक साथ चुनाव करवानें में बीजेपी को नुकसान हो सकता था. तो ऐसे में इससे मोदी एंड कंपनी पीछे हट गई.

एक देश एक चुनाव करवाने की बात करना आसान है लेकिन चुनाव करवाने के लिए क्या हमारा चुनाव आयोग तैयार है. तो इसका जवाब है नहीं. चुनाव आयोग खुद ही मना कर चुका है कि वो एक साथ पूरे देश में चुनाव नहीं करवा सकते. लेकिन इसे अर्धसत्य के तौर पर देखना चाहिए. चुनाव आयोग ने अपने उसी बयान में कहा था कि, चुनाव आयोग एक साथ 11-12 राज्यों के चुनाव आयोग के साथ लोकसभा चुनाव करवा सकते है.

चुनाव आयोग को चुनाव करवाने के लिए ईवीएम और वीवीपैट की संख्या का भी ध्यान रखना होता है. इसके साथ ही चुनाव आयोग को कई परेशानियों से गुजरना पड़ता है. चुनाव आयोग ने सभी बातों को ध्यान में रखकर ही 11-12 राज्यों के साथ साथ लोकसभा चुनाव आयोग को करवाने की बात कही थी. यानि चुनाव आयोग एक देश एक चुनाव की संभावनाओं को जीवित रखता है.

ऐसे में सबसे बड़ सवाल होता है, मोदी मैजिक बढ़ा, चुनाव आयोग तैयार, तो फिर क्यों मोदी एंड कंपनी एक देश एक चुनाव से पीछे हट गई. या फिर बीजेपी जिन राज्यों के विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव करवाना चाहती थी, उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भरोसे में नहीं ले पाई. अगर इस वर्जन की तरफ गौर करे तो ऐसा नहीं लगता क्योंकि ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकार है.

एक देश एक चुनाव न होते का एक वर्जन और भी है. बीजेपी अभी सिर्फ लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर अपनी तैयारियां कर रही है. बीजेपी जिन राज्यों में अपनी सहयोगी दलों के साथ चुनाव लड़ती है, उन राज्यों में अभी सीटों के बंटवारे को लेकर ही बात फाइनल नहीं हुई है. जब सीटों की बात हो जाएगी, उसके बाद कौन सी सीट किस पार्टी के खाते में जाएगी, उसको लेकर मामला फसेगा. फिर जिताऊ उम्मीदवारों की लिस्ट फाइनल करना.

जिन राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ करवानों की चर्चा थी, उन राज्यों में बीजेपी को अपने सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे से लेकर उम्मीदवारों की लिस्ट फाइनल करने के लिए समय चाहिए. और जब चुनाव सिर पर हो तो समय किसके पास है. इन बातों से एक बात तो साफ तौर पर जाहिर होती है, बीजेपी खुद ही तैयार नहीं है तो ऐसी स्थिति में बीजेपी आधी अधूरी तैयारी के साथ चुनावों में उतरने का जोखिम नहीं लेना चाहती थी.  

 

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