दिल्ली में आम आदमी पार्टी से गठबंधन क्यों नहीं करना चाहती कांग्रेस ?

दिल्ली में कांग्रेस को उम्मीद है कि वो अगर अकेले चुनाव लड़ी तो इसका उसे फायदा मिलेगा. इसलिए वो आम आदमी पार्टी से गठबंधन करने को तैयार नही है. साथ ही अगर दिल्ली में कांग्रेस गठबंधन करके लड़ती है तो उससे संदेश जाएगा कांग्रेस मजबूत नहीं है. जिससे उसे घाटा होने की उम्मीद है.

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दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच लोकसभा चुनावों के लिए कोई गठबंधन अभी तक नहीं हुआ है. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे है. वहीं दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल ने गठबंधन के लिए एक बार भी बात नहीं की है.

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है कि, अरविंद केजरीवाल किस आधार पर यह बयान दे रहें है मुझे नहीं पता, क्योंकि अरविंद ने अभी तक गठबंधन के बारे में एक बार भी बात नहीं की है.

इससे पहले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि, बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ सिर्फ एक ही उम्मीदवार उतारना चाहिए. वोट बंटना नहीं चाहिए. कांग्रेस से गठबंधन की बात करते करते थक गए, लेकिन कांग्रेस ने गठबंधन नहीं किया. अगर आज हमारा कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए तो बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीट हार जाएगी.

तो इसलिए कांग्रेस से गठबंधन करना चाहते है केजरीवाल 

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के बयान से लगता है कि वो कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए कुछ ज्यादा ही उतावले है. इसके पीछे एक कारण भी है. अगर 2014 लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के वोट शेयर को जोड़ दिया जाए तो वो बीजेपी से ज्यादा होता है.

दिल्ली में लोकसभा की 7 सीटें है. 2014 आम चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस से ज्यादा था. लेकिन अगर आप और कांग्रेस का वोट शेयर जोड़ दिया जाए तो दिल्ली की 6 लोकसभा सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर कम होता है.

सीट/  पार्टी वोट शेयर बीजेपी कांग्रेस आप कांग्रेस+ आप
चांदनी चौक 44.6 17.95 30.72 48.67
नार्थ ईस्ट दिल्ली 45.25 16.31 34.31 50.62
ईस्ट दिल्ली 47.83 16.99 31.91 48.9
नई दिल्ली 46.75 18.86 29.97 48.83
नार्थ वेस्ट दिल्ली 46.45 11.61 38.57 50.18
साउथ दिल्ली 45.17 11.36 35.47 46.83
वेस्ट दिल्ली 48.32 14.34 28.4 42.74

 

2014 के आम चुनावों के बाद से ही दिल्ली में कांग्रेस का ग्राफ गिरता चला गया. 2015 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को दिल्ली की 70 में से 67 सीटों पर जीत मिली. आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 50 फीसदी से अधिक था. वहीं कांग्रेस का वोट शेयर 9 फीसदी रहा.

2017 में जब दिल्ली में एमसीडी के चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी का वोट शेयर गिरा. वहीं कांग्रेस का वोट शेयर बढ गया.  कांग्रेस का वोट शेयर 21.28 फीसदी हुआ तो आम आदमी पार्टी का वोट शेयर घटकर 26 फीसदी रह गया. बीजेपी को 36 फीसदी वोट मिले थे.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी को बचाए रखने की चुनौती है. जिस तरह से आम आदमी पार्टी का ग्राफ ऊपर उठा था ठीक उसी तरह से नीचे भी आ रहा है. इसलिए अपनी पार्टी को बचाने के लिए केजरीवाल कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए उतावले दिख रहे है.

कांग्रेस क्यों नहीं चाहती गठबंधन

दिल्ली में कांग्रेस को उम्मीद है कि वो अगर अकेले चुनाव लड़ी तो इसका उसे फायदा मिलेगा. इसके पीछे कारण भी है. 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को दिल्ली की सभी 7 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 2004 के आम चुनावों में बीजेपी को 6 सीटे मिली थी. जबकि 1999 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने दिल्ली की सभी 7 सीटे जीती थी. यानि दिल्ली का वोटर कांग्रेस पर भरोसा रखता है.

वहीं दिल्ली कांग्रेस की कमान शीला दीक्षित के हाथों में आने के बाद पार्टी को उम्मीद है कि उसका प्रदर्शन बेहतर होगा. शीला दीक्षित 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही है और पार्टी पर भी उनकी पकड़ अच्छी बताई जाती है. ऐसे में कांग्रेस को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है.

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का अगर गठबंधन हुआ को बात सीटों पर अटक जाएगी. आम आदमी पार्टी को कवर करने वाले ज्यादातर पत्रकारों की माने तो केजरीवाल तीन सीट की डिमांड कर रहे है जो कांग्रेस को मंजूर नहीं है.

बता दें, राहुल गांधी ने देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के साथ गठबंधन नहीं किया और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया. इसके पीछे एक तर्क यह भी है कि इससे राहुल गांधी की छवि मजबूत हुई. क्योंकि जनता के बीच यह संदेश गया की कांग्रेस ही बीजेपी का जवाब है. वहीं अगर दिल्ली में कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव लड़ती है तो संदेश जाएगा की कांग्रेस मजबूत नहीं है. जिसका मैसेज पूरे देश में जाएगा.

दिल्ली बीजेपी में गुटबाजी काफी अंदर तक है. बीजेपी के कार्यकर्ता दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी से ही खुश नहीं है. वहीं हर्षवर्धन और विजय गोयल के अपने अपने गुट सक्रिय है. बीजेपी की इस गुटबाजी का सीधा फायदा कांग्रेस को मिलने की उम्मीद है.

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