मसूद अजहर का साथ, भारत का विरोध, आतंकवाद के खिलाफ चीन की रणनीति क्या है?

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25-11-2018 को चीन सरकार के मुखपत्र कहे जाने वाले ग्लोबल टाइम्स में एक लेख का शीर्षक था Terror attack won’t shake China-Pakistan cooperation. इस लेख के शीर्षक से ही समझा जा सकता है कि आतंकवाद के खिलाफ चीन की रणनीति क्या है. यह लेख पिछले साल नवंबर महीने में पाकिस्तान में चीनी दूतावास पर हुए हमले के बाद लिखा गया था.

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ. इस हमले में 40 जवान शहीद हुए. पुलवामा हमले के बाद भारत ने कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान को घेरने के लिए उससे एमएनएफ का दर्जा छीन लिया. साथ ही पाकिस्तान से आने वाले सामान पर टैक्स को 200 फीसदी तक बढ़ा दिया गया. साथ ही भारत ने एक बार फिर यूएन से मसूद अजहर को अतंराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की मांग की थी. लेकिन चीन ने अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर ऐसा करने से यूएन को रोक दिया. ऐसा नहीं है कि चीन ने ऐसा पहली बार किया है. चीन इससे पहले भी भारत की इस कोशिश में अंड़गा लगा चुका है. ऐसे में सवाल होता है कि आखिर चीन ऐसा करता क्यों है.

इस सवाल का जवाब जानने से पहले यह भी जान लेना जरूर है कि पूरी दुनिया में सिर्फ भारत ही अकेला ऐसा देश नहीं है जो आतंकवाद से परेशान है. साल 2018 में GLOBAL TERRORISM INDEX 2018 की रिपोर्ट में चीन का स्थान भी टॉप 50 की सूची में शामिल था. इसी रिपोर्ट में भारत को 7वां स्थान दिया गया जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान 5वें स्थान पर था. इस सूची में सबसे ऊपर ईराक था.

KAGGALE.COM बेवसाइट ने GLOBAL TERRORISM DATABASE का अध्ययन करके एक रिपोर्ट लिखी जिसमें कहा गया कि साल 1983 से लेकर 2015 तक चीन में करीब 242 आतंकवादी घटनाए हुई जिसमें 2917 लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी.

Terrorism in China: Growing Threats with Global Implications के लेखक Phillip B. K. Potter ने साल 2013 में अपने लेख में इस बात को बताया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने अपनी आतंकवाद की पालिसी को भी बदला. माऊ के समय में चीन खुले तौर पर फिलिस्तीन के चरमपंथियों के गुटों को बढ़ावा देता था. लेकिन डेंग जियाओपिंग के काल में चीन ने ऐसा करना बंद कर दिया.

सीपेक परियोजना

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वपूर्ण सीपेक परियोजना ने इस सबको पीछे छोड़ दिया है. चीन इस परियोजना के सहारे आतंकवाद को खत्म करने की सोच रहा है. लेकिन आतंकवाद को लेकर चीन की पालिसी अभी तक साफ नहीं हुई है. सीपेक परियोजना के सहारे चीन दोबारा से सिल्क रूट को जिंदा करना चाहता है. इस परियोजना के लिए चीन ने पानी की तरह पैसा बहाया है. इस परियोजना पर एक अनुमान के मुताबिक चीन ने करीब 56 बिलियन डॉलर खर्च किए है.

इस परियोजना को लेकर चीन को विरोध का सामना भी करना पड़ा रहा है. पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान के चरमपंथी संगठन इसका विरोध करते है, यह विरोध हिंसक तौर पर भी होता है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है. ऐसें में चीन का पाकिस्तान में भारी निवेश करने के कारण वो पाकिस्तान का लगातार समर्थन कर रहा है. विदेश मामलों के जानकारों की माने तो चीन इस परियोजना के सहारे भारत को घेरना चाहता है. साथ ही दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने, और भारत की पकड़ को कमजोर करने के लिए ऐसा कर रहा है.

पूरी दुनिया में आतंकवाद को कैसे खत्म किया जाए. इसको लेकर सभी देश चर्चा करते है. लेकिन इसमें एक बड़ा विरोधाभास भी है. दुनिया अभी तक यही तय नहीं कर पाई है कि आतंकवाद की परिभाषा क्या है. सभी देश अपने हिसाब से आतंकवाद को परिभाषित करते है.

साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने भाषण में कहा था कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र समझौते (सीसीआईटी) का प्रस्ताव किया था. भारत के इस प्रस्ताव में वकालत करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि,”एक तरफ हम आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं लेकिन दूसरी तरफ हम उसकी परिभाषा भी तय नही कर पा रहे हैं.”

 

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